Tue, 12 Jul 2022

कहानी आम की: अबुल फज़ल की 'आईने-अकबरी' से लेकर वात्स्यायन के कामसूत्र तक

कहानी आम की: अबुल फज़ल की 'आईने-अकबरी' से लेकर वात्स्यायन के कामसूत्र तक

 उसका गाना आश्वस्त करता है कि हर शाम डूबने से पहले सूरज अपना रंग हौले-हौले उन कच्चे फलों के भीतर भर रहा होगा.

आम पकने के मौसम में उसका गूदा शीतल सूर्यास्त के रंग का हो चुका होगा और उनकी आत्मा में कोयल की वाणी की मिठास भर गई होगी.आम

आम हमारे देश की स्मृति का हिस्सा है. आम के पहले बौर से लेकर उसकी गुठली तक उसका कोई हिस्सा नहीं जो कहावतों-लोक कथाओं-कविताओं और किस्सों का विषय न बन गया हो.

आम पन्ना, अमचूर, अचार, चटनी, आमपट्टी जैसी चीज़ों के बगैर हमारी रसोइयां किस कदर नीरस होतीं!आम

आम से विशेष अनुराग रखने वाले इस नवाब और उसकी संततियों ने अगले कई दशकों तक अपने बगीचों में आम की तमाम नई प्रजातियां विकसित कीं.आम

इन्हीं में से एक नवाब हुसैन अली मिर्ज़ा बहादुर के बगीचे में उगने वाले कोहे-तूर नाम के आम की कहानी यह है कि एक यूनानी हकीम आगा मोहम्मद ने उसे सबसे पहले उगाया.

कोहे-तूर का फल इतना सुडौल और स्वादिष्ट था कि जब हकीम साहब उसकी एक टोकरी नवाब साहब के पास तोहफ़े के बतौर लेकर गए तो नवाब ने पूरे के पूरे पेड़ की माांग कर डाली.

समूचा पेड़ उखाड़ कर नवाब के बगीचे में लगाया गया, हकीम आगा को मुआवज़े के दो हजार रुपये दिए गए और कोहे-तूर को सिर्फ़ नवाबों के लिए सीमित कर दिया गया.आम

ये वाकया आज से सवा सौ साल पहले यानी 1897 में प्रबोध चन्द्र नाम के एक उद्यान-विशेषज्ञ द्वारा लिखी गई किताब 'अ ट्रीटीज़ ऑन मैंगो' में दर्ज है. प्रबोध चद्र मुर्शिदाबाद के निज़ामत गार्डन्स के सुपरिटेंडेंट हुआ करते थे.

इस महत्वपूर्ण पुस्तक में उस ज़माने के मुर्शिदाबाद में उगने वाले आमों की विस्तृत सूची है जिसमें अली बख्श, बीरा, बिजनौर सफ-दा, दो-अंटी, दूधिया, काला पहाड़, खानम पसंद और नाज़ुक बदन जैसा कुल एक सौ तीन प्रजातियों का ज़िक्र है.

किताब के अंतिम हिस्से में मालदा में उगवने वाली आम की पचास प्रजातियों के अलावा दरभंगा, जियागंज, बंबई, गोवा, मद्रास, मैसूर, जयनगर और हाजीपुर के आमों की लिस्ट भी दी गई है.आम

मुर्शिदाबाद के आम के बागानों के साथ एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी जुड़ा हुआ है कि 1757 की प्लासी के युद्ध के दौरान रॉबर्ट क्लाइव की फ़ौज ने अपना पड़ाव मुर्शिदाबाद से तीस मील दूर आम के एक विशाल बगीचे में ही डाला था.

लिखे को सबूत मानें तो भारतीय उपमहाद्वीप में पिछले चार हज़ार सालों से आम खाया जा रहा है. वाल्मीकि रामायण में सीता की खोज में निकले हनुमान रावण की लंका में स्थित अशोक वाटिका के आम्र-कानन वाले हिस्से में पहुंच जाते हैं.

आम
पत्तिनिहेला के मुताबिक़, तो सुन्दर स्त्रियों की उत्पत्ति आम के फल के भीतर से हुई थी. कालिदास के यहां बिना आम और बौरों के आधी उपमाएं पूरी नहीं होतीं.

कालीदास उसे वसंत के पांच बाणों में एक बतलाते हैं. ह्वेन सांग और इब्न बबूता के यात्रा वृतांतों में आम के बारे में लिखा गया है.आम

अबुल फज़ल की 'आईने-अकबरी' के हवाले से बताया जाता है कि अकबर और जहांगीर के शासनकाल के दरम्यान हुसैन नाम का एक हकीम था जिसके बगीचे में आमों की अनेक प्रजातियां उगाई जाती थीं.

उसकी इस खूबी से प्रसन्न होकर उसे पहले आगरा और बाद में बिहार का गवर्नर बना दिया गया.आम


भारतीय उपमहाद्वीप के चप्पे-चप्पे में जनसाधारण से लेकर बादशाहों तक के भीतर आम को लेकर जिस तरह का ऑब्सेशन पाया जाता है, उसके मद्देनज़र इस तथ्य से ज़रा भी हैरानी नहीं होती कि हर इलाक़े के अपने आम हैं और उनसे जुड़ी कहानियां हैं.

आम

साल 1498 में कलकत्ते में उतरे पुर्तगाली नाविकों ने जब पहली दफ़ा आम को चखा तो उसके स्वाद का उन पर ऐसा जादू चला कि उन्होंने इस अद्वितीय फल को दुनिया भर में ले जाने का फ़ैसला किया.

नतीजतन सोलहवीं शताब्दी में भारत का आम ब्राज़ील पहुंच चुका था. वेस्ट इंडीज़ में एक ख़ास आम की प्रजाति सबसे अधिक चलती है - नंबर 11.आम

इसकी कहानी यूं है कि 1782 में जमैका के तट पर अंग्रेजों द्वारा एक फ्रांसीसी जहाज़ पर कब्ज़ा कर लिया गया. जहाज़ में मसाले और आम लदे हुए थे.आम

लूट के आम खाए गए और एक नज़दीकी गिरजाघर के बगीचे में उसके बीज बो दिए गए. बीजों से उगे पौधों को संख्याएं आवंटित की गईं.आम

उन सैकड़ों पौधों में से केवल एक ही बच सका. इस तरह ग्यारह नंबर आम अस्तित्व में आया. क़रीब सौ साल बाद भारत से आम की क़रीब दो दर्जन अन्य प्रजातियां जमैका ले जाई गईं.