Sun, 12 Jun 2022

कुलदीप बिश्नोई ने कैसे हरियाणा राज्यसभा चुनाव में कुचल दिया सांपनाथ भूपेंद्र सिंह हुड्डा का फन?

कुलदीप बिश्नोई ने कैसे हरियाणा राज्यसभा चुनाव में कुचल दिया सांपनाथ भूपेंद्र सिंह हुड्डा का फन?

कांग्रेस पार्टी ने रविवार को घोषणा की कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने हरियाणा के विधायक कुलदीप बिश्नोई (Kuldeep Bishnoi) को पार्टी के सभी पदों से बर्खास्त कर दिया है. बिश्नोई का गुनाह था कि उन्होंने अंतरात्मा की आवाज़ सुनते हुए राज्यसभा चुनावमें अपनी पार्टी (Congress) के प्रत्यासी अजय माकन को वोट नहीं दे कर बीजेपी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा को वोट दिया. चूंकि राज्यसभा चुनाव (Rajya Sabha Election) में गोपनीय मतदान नहीं होता और विधायकों को अपनी पार्टी के एजेंट को अपना बैलट दिखना अनिवार्य है, सभी को पता था कि बिश्नोई ने क्रॉस-वोटिंग की है, जिसका अंदेशा काफी समय से था.

वैसे अगर बिश्नोई माकन (Ajay Maken) के पक्ष में वोट देते भी तो उनकी जीत तय नहीं थी, क्योकि माकन को जीत के लिए जरूरी न्यूनतम 31 मतों के मुकाबले 29 मत ही मिला था, यानि फिर भी एक वोट कम ही रह जाता और वह एक मत था किरण चौधरी का जिनका बैलट किसी तकनीकी कारण से रद्द करार दिया गया. अगर माकन को 30 वोट भी मिल गया होता तो फिर भी कार्तिकेय शर्मा की जीत पक्की थी, क्योकि उस स्थिति में भी भी दुसरे दौर की मतगणना होती, जिसमे कार्तिकेय शर्मा का पलड़ा भारी था. राज्यसभा चुनावों में हरेक विधायक को दो वोट देना होता था, पहला मत और दूसरा मत यानि पहली प्राथमिकता और दूसरी प्राथमिकता. जब पहले दौर की मतगणना में विजेता नहीं चुना जाता है तो फिर दुसरे मत की गणना होती है और माकन के मुकाबले कार्तिकेय शर्मा दुसरे मत में काफी आगे थे.

यह पहला अवसर नहीं है कि राज्यसभा चुनाव में हरियाणा (Haryana) में कांग्रेस प्रत्यासी की हार हुई हो. शनिवार को जो हुआ वह 2016 की पुनरावृत्ति थी जब 13 कांग्रेसी विधायकों का मत रद्द कर दिया गया था क्योकि जानबूझ कर उन्होंने गलत स्याही का इस्तमाल किया था जिसकी बदौलत सुभाष चंद्रा निर्दलीय के रूप में चुने गए थे. बता दें कि राज्यसभा और राष्ट्रपति का चुनाव दलबदल कानून के अन्तरगत नहीं आता है, और पार्टी के खिलाफ मतदान करने के कारण किसी की विधायकी रद्द नहीं की जा सकती.

बिश्नोई ने क्यों दिया पार्टी के खिलाफ वोट?

सवाल है कि क्यों बिश्नोई ने पार्टी के खिलाफ मत दिया और क्यों किरण चौधरी ने जानबूझ कर गलत मतदान किया? कांग्रेस पार्टी के पास पूरा एक हफ्ता था कि उन्हें मना सकें. कांग्रेस में 31 विधायकों में से सिर्फ 28 ही छत्तीसगढ़ के एक लक्ज़री रिसोर्ट में एक हफ्ता गुजारने के लिए गए थे, ताकि उन्हें बीजेपी, कार्तिकेय शर्मा और उनके पिता विनोद शर्मा के किसी प्रलोभन से दूर रखा जा सके. पर कांग्रेस आलाकमान इससे बेखबर रही. उनका मानना था कि माकन को जीतने की पूरी जिम्मेदारी पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की है, जिनके आगे कांग्रेस पार्टी ने घुटने टेक दिए हैं. और यही कारण है कि बेचारे माकन बलि का बकरा बन गए. बिश्नोई हो या किरण चौधरी, उन्हें माकन से कोई शिकायत नहीं है, पर अगर माकन जीत जाते तो फिर हुड्डा की छाती और चौड़ी हो जाती.

बिश्नोई पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के पुत्र हैं और किरण चौधरी पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल की पुत्रवधू. कांग्रेस पार्टी जिस तरह से लगातार हुड्डा के सामने झुकती जा रही है, उससे ये दोनों खानदानी नेता खुश नहीं थे. 2005 में जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने भजनलाल को नज़रअंदाज करके हुड्डा को मुख्यमंत्री बनाया तब पिता-पुत्र ने पार्टी से बगावत करके अपनी खुद की पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस का गठन किया था. फिर 2009 के विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह से हुड्डा ने हरियाणा जनहित कांग्रेस के चार विधायकों को खरीद कर कांग्रेस पार्टी में शामिल किया था, उससे बिश्नोई हुड्डा से नाराज़ हो गए थे. हरियाणा जनहित कांग्रेस बाद में बीजेपी की सहयोगी दल बन गयी पर 2019 के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी ने बिश्नोई को एनडीए का मुख्यमंत्री पद का उम्मेदवार बनाने से माना कर दिया तो वह वापस कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए. यानि बिश्नोई शुरू से ही महत्वपूर्ण पद चाहते रहे हैं और उस में कोई बदलाव नहीं आया है.

कांग्रेस आलाकमान ने नहीं ली सुध

अब जबकि मुख्यमंत्री बनने का समय नहीं था तो उनकी इच्छा थी कि उन्हें हरियाणा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाये. पर हुड्डा के दबाब में पार्टी ने हुड्डा के सहयोगी उदयभान को कुछ समय पहले अध्यक्ष बना दिया जिससे बिश्नोई नाराज़ थे. उन्होंने इसके खिलाफ बयान भी दिया और कई बार राहुल गांधी से मिलने के लिए समय माँगा, पर राहुल गाँधी अपने विदेश दौरों में ही व्यस्त रहे और बिश्नोई इंतजार करते रहे. बिश्नोई के मुकाबले उदयभान काफी हल्के नेता हैं. बिश्नोई अपनी पिता की तरह गैर-जाट कांग्रेस के बड़े नेता माने जाते हैं. राज्यसभा चुनाव की घोषणा के बाद से ही वह अंतरात्मा मतदान की बात कर रहे थे, पर कांग्रेस आलाकमान ने इसकी सुध नहीं ली. इसका परिणाम हुआ कि अजय माकन हार गए. रही बात किरण चौधरी की हो वह भी हुड्डा के विरोधियों में गिनी जाती हैं. जिस तरह हुड्डा के दबाब में 2019 के चुनाव के कुछ ही महीनों पहले उन्हें नेता प्रतिपक्ष पद से हटा कर हुड्डा को नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया, वह तब से ही हुड्डा विरोधी बन गयी. इस दोनों नेताओं का राज्यसभा चुनाव में मत कांग्रेस पार्टी या गाँधी परिवार के खिलाफ ना हो कर हुड्डा हो नीचे गिराने के लिए था, जिस में वह सफल हो गए.

अगर देखे तो हुड्डा की जिद्द के कारण ही बेचारे अजय माकन की हार हुयी. कांग्रेस आलाकमान यानि राहुल गाँधी ने मन बना लिया था कि उनके दो करीबी सहयोगी माकन और रणदीप सिंह सुरजेवाला को राज्यसभा भेजना है. माकन कांग्रेस महासचिव के रूप में राजस्थान के प्रभारी हैं और सुरजेवाला जो कांग्रेस महासचिव होने के साथ ही पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता हैं, वह हरियाणा के नेता हैं. तरीके से सुरजेवाला को हरियाणा से माकन को राजस्थान से चुनाव लड़ना चाहिए था, पर हुड्डा सुरजेवाला को हरियाणा से प्रत्यासी बनाने को तैयार नहीं थे. अगर सुरजेवाला हरियाणा से चुनाव जीत जाते तो फिर हुड्डा कमजोर जो हो जाते. सीटों के अदल-बदल हो गयी, सुरजेवाला तो जीत गए, पर माकन की बलि चढ़ गयी.